लाल बत्ती को लाल झंडी


     अरे ! अब क्या होंगा उन नेताओं का ? जिनके लिए लाल बत्ती ऑक्सीजन की तरह थी। जब वे चार पहिया वाली गाड़ी में दौरा करते तो लप्पक-झप्पक करती लाल बत्ती की ऊंची आवाज साँय साँय को सुनकर लोग स्वतः ही रास्ता दिया करते थे। लाल बत्ती वाली गाड़ी में बैठकर नेताओं की छाती दो इंच चौड़ी हो जाती थी। लाल बत्ती नेताओं के रौंब के कारण चमकती इठलाती थी। लेकिन जब से दिल्ली से यह फरमान जारी हुआ है कि 1 मई से कोई भी लाल बत्ती का हंडा अपनी गाड़ी के सिर पर नहीं लगा सकेगा। तब से नेताओं, मंत्रियों के चेहरे मुरझाये हुए से नजर आ रहे है। ऐसा लग रहा है कि जैसे लाल बत्ती ही उनसे नहीं छिन ली गई है बल्कि उनकी इज्जत भी चली गयी है। बिना लाल बत्ती की गाड़ी का सोच-सोचकर उनकी हालत पतली हो रही है। डरावने सपने उन्हें रात को सूकून की नींद नहीं दे रहे है। उन्हें डर है कि कई बिना लाल बत्ती के कोई ठोंक ना दें। एकमात्र सुरक्षा कवच थी जो लाल बत्ती आज जब विदाई की अंतिम कड़ी पर है तो नेताओं के घडियाली आंसू निकलने स्वाभाविक ही है।
red light car
      जब हमारे मंत्री-मुख्यमंत्री लाल बत्ती की गाड़ी में सवार होकर घूमा करते थे तो टोल नाके के बिरेयर दूर से ही लाल बत्ती की चमक देखकर खुल जाये करते थे। लेकिन अब तो बिना लाल बत्ती के मंत्रियों को टोल की कतार में घंटो खड़े रहकर टोल टैक्स भी अदा करना पडेगा। ट्रेफिक की मार भी झेलनी पडेगी। और तो और कोई अब उन्हें मुंह उठाकर देखेंगा तक नहीं। बिना लाल बत्ती के काईका मंत्री और मुख्यमंत्री। अब असल मयाने में वे जनसेवक बन जायेंगे। खास से आम बनने की यह ऐतिहासिक पहल जन सामान्य के धूप में जले चेहरों पर मंद-मंद मुस्कान ले आयी है। दिल बाग-बाग हो गया है। लेकिन हुजूर ! केवल लाल बत्ती के हटाने भर से वीआईपी और वीवीआईपी कल्चर खत्म नहीं हो जाता। एक ओर फरमान जारी कीजिये – जब नेताओं का काफिला गांव-शहर से गुजरे तो सार्वजनिक रास्ते बंद नहीं किये जायें। बेफिजूल की मंत्रियों को मिलने वाली सेवाओं पर अंकुश लगाये। ताकि मंत्रियों के सिर पर चढ़ा दम्भ का दानव मरे और वे सातवें आसमान से धरती पर धरे। तब उन्हें पता चले कि जनता जनार्दन की क्या-क्या परेशानियां है। माय लॉर्ड ! लाल बत्ती को लाल झंडी दिखाने का फैसला आपके शासन के प्रति जनमानस में खोया हुआ भरोसा पुनः जगा गया है। लगता है कि सालों के बाद ऊंट पहाड़ के नीचे आया है।
      अब एम्बुलेंस वालों और अग्निशामक वालों से मंत्री जी खिन्न-खिन्न से नजर आयेंगे। और एम्बुलेंस और अग्निशामक वाले फूले नहीं समायेंगे। अब मम्मी-पापा भी यह कहकर ताना नहीं मारेंगे कि देखो ! वह शर्मा जी, वर्मा जी का बेटा लाल बत्ती में घूम रहा है। वाकई में लाल बत्ती के गुल होने से केवल नेताजी की पत्नी ही नहीं बल्कि पडौस की कई पत्नियां भी खुश नजर आने लगी है। चलते-चलते, जिन कारों पर लाल और नीली बत्ती के हंडे है, उनमें बैठे लोग अधिकत्तर गुंडे है।                                                                                            लेखक —–देवेन्द्र राज सुथार
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