छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली हमला


कब तक निंदा, बदला और ट्वीट से काम चलता रहेगा और जवान मरते रहेंगे (प्रेषक–मो.तौहिद आलम)

      छत्तीसगढ़ के सुकमा में फिर गश्ती कर रहे अर्धसैनिक बल के 26 जवान शहीद हो गए। ये सभी जवान चिंतागुफा के बुर्कापाल में सड़क सुरक्षा के लिए गश्ती कर रहे थे। तभी पहले से घात लगाए नक्सलियों ने 300 की संख्या में हमला कर देश के 26 सपूतों को मौत की निंद सुला दी। ऐसी घटना से किसी का भी दिल दहल जाए। छत्तीसगढ़ में ये कोई पहली वारदात नहीं है। इससे पहले भी वहां जवान शहीद होते आ रहे हैं। चाहे यूपीए सरकार हो या राजग सभी के दौर में जवान शहीद होते आ रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक सभी पार्टी प्रचार में जोर-शोर से लगे हैं। बीच-बीच में लोगों को असल मुद्दा से भटकाने के लिए सोची-समझी राजनीति के तहत ऐसी तीर छोड़ी जा रही है, जिसमें पूरा देश उलझकर असल मुद्दों को भूल जा रहा है। और इसमें टेलिविजन मीडिया की एक बहुत अहम भूमिका है।

   आखिर कब तक जवान आतंकवाद और नक्सलवाद की भेंट चढ़ते रहेंगे। कब तक इनकी मौतों पर ट्वीट और निंदा से काम चलाया जाएगा। शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, समय आने पर बदला लेंगे। एक के बदले दस को मारेंगे। इरादे में कामयाब नहीं होने देंगे। जैसे मीठे  शब्दों से कब तक लोगों का दिल बहलाया जाएगा ? सोशल मीडिया पर हम लोग भी कितने जोश में आ जाते हैं। लेकिन कभी ये सोचते हैं उन शहीदों के घर वालों पर क्या बीत रही होगी? हमारी ही तरह उनका भी एक हंसता-खेलता परिवार है। मां-बाप, भाई-बहन, दोस्त, रिश्तेदार हैं।

   प्रतिदिन सैनिक मर रहे हैं। लेकिन सरकार निंद से नहीं उठ पा रही है। नवंबर 2016 में नोटबंदी के प्रभावों को गिनाते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि इससे नक्सलियों की कमर टूट जाएगी। इससे देश के लोगों में एक उम्मीद जगी थी। उन्होंने नोटबंदी का तहेदिल से स्वागत किया, और तमाम दुश्वारियों के बाद भी प्रधानमंत्री के इस अभियान में अपना सहयोग दिया। नक्सलियों द्वारा हालिया हमला दर्शाता है कि अपना अस्तित्व बताने के लिए वो ऐसा कर रहे हैं। क्योंकि नोटबंदी से नक्सलियों की कमर टूटने की बात कही गई थी। शायद इसके बाद नक्सली ये बताना चाहते हैं कि हम अभी जिंदा है, अभी हम में काफी जान बाकी है, और हम आपके अर्धसैनिक बल को निशाना बना सकते हैं।

  हमले के बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का बयान भी इसी तरह इशारा कर रहा है। रायपुर में अपने भाषण में उन्होंने कहा कि, केंद्र और राज्य सरकार द्वारा की जा रही कारर्वाईयों से नक्सलियों में  बौखलाहट है, और ये हमला उसी का परिणाम है। उन्होंने कहा कि हमें पहले से ही यह आशंका थी कि नक्सली ऐसा कर सकते हैं। उनके अंदर अभी बौखलाहट है। फिर सवाल उठता है कि अगर गृहमंत्री को पहले से इसकी सूचना थी तो उन्होंने इसकी क्या तैयारी की थी ? या फिर वो भी यहीं मानते हैं कि जवान होते हीं है शहीद होने के लिए।

नक्सलियों की मंशा क्या है

       हमले के बाद राजनाथ सिंह ने कहा- सुकमा हमला कायराना है, हम नक्सलियों को उनके इरादे  में कामयाब नहीं होने देंगे। देश के गृहमंत्री का यह बयान अपने आप में काफी कुछ कहता है। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि सरकार को पता है कि नक्सलियों की मंशा क्या है। अगर ऐसा है तो अब तक उनसे बात कर इसे सुलझाने की कोशिश क्यों नहीं की गई। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सी आर पी एफ में नेतृत्व का संकट नहीं है। जरूरत पड़ने पर और भी सीनियर अधिकारी को भेजा जाएगा। तो क्या अबतक जरूरत महसूस नहीं हो रही, इसका तो यहीं मतलब निकलता है। यानी जवानों के मरने से नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ता। सैनिक लगातार शहीद हो रहे हैं और गृहमंत्री के तरफ से यह गैर जिम्मेदाराना बयान आता है कि जरूरत पड़ने पर और सीनियर अधिकारी को भेजा जाएगा। क्या मैं गृहमंत्री से पूछ सकता हूं कि वह समय कब आएगा। शायद जब वहां तैनात सभी जवान मार दिए जाएंगे तब। क्या सीनियर अधिकारी के रहने से हमले नहीं होंगे। कितने अधिकारी नक्सली या आतंकियों से लड़ते हैं। अक्सर देखा जाता है कि हमले में शहीद जवान ही होते हैं। अधिकारियों को खरोच तक नहीं आती। हालांकि कुछ अधिकारी हैं जो अपनी जान पर खेल नक्सली और आतंकवादियों से लोहा लेते हैं।

राज्य पुलिस और केंद्रीय बलों में सामंजस्य की कमी

  जवानों पर अचानक हमला होना और राज्य पुलिस को एक भी खरोच नहीं आना, कम से कम इसी बात की तरफ इशारा कर रहा है। अचानक 300 की संख्या में नक्सली आ कहां से गए ? उन्हें इतने घातक और मॉर्डन हथियार कहां से मिल रहे हैं ? क्या इसकी खबर राज्य पुलिस के आला अधिकारियों को नहीं थी ? जबकि राज्य पुलिस को थानों से खुफिया जानकारी भी मिलती है। आखिर ये नक्सली इतनी बड़ी संख्या में आए कहां से, कहीं तो कैंप किया होगा? इसकी प्लानिंग पहले से चल रही होगी। तो फिर राज्य पुलिस इतनी गहरी नींद में कैसे सो सकती है? क्या नक्सलियों से निपटना सिर्फ केंद्रीय बलों का कर्तव्य है। क्या राज्य पुलिस से इस अभियान में अर्धसैनिक बलों को सहायता मिल रही है। या फिर कहीं न कहीं राज्य और केंद्र में सामंजस्य की कमी है। अगर राज्य पुलिस सीआर पी एफ को कवर देती तो इतने जवान शायद शहीद नहीं होते।

आम लोगों की सरकार से पलटवार की उम्मीद

      पिछली सरकार की नाकामी की वजह से देश ने इतना बड़ा जनाधार देकर एनडीए सरकार को सत्ता में लाया। लोगों में उम्मीद थी कि यह सरकार वाकई दुश्मनों से लोहा लेकर सीमा और देश के अंदर जवानों को शहीद होने से रोकेगी। 2014 से नरेंद्र मोदी की बातों से लोगों को यही उम्मीद थी। जिसका परिणाम दशकों से सत्ता में रही पार्टी को लोगों ने उजाड़ फेंका, इसी उम्मीद के साथ कि नये सरकार में अच्छे दिन सबके आएंगे। अब धैर्य के बांध भी टूटने लगे हैं। सैनिकों की मौत पर लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया पर देखा जा सकता है। अब वक्त है कि सरकार देश की इस जनाधार को सही साबित करते हुए, नक्सलवाद और आतंकवाद को ऐसी सबक सिखाए कि लोगों को अपने वोट पर गर्व महसूस हो।

छत्तीसगढ़ में हुए हमलों पर एक नजर

   इसी साल 11 मार्च 2017 में सुकमा के भेज्जी थाना इलाके में मुठभेड़ के दौरान 11 जवान शहीद हो गए थे। बस्तर के आई जी प्रभारी सुंदरराज पी के अनुसार उस दिन सीआर पी एफ की 62वीं बटालियन भेज्जी थाना क्षेत्र में रोड़ खुलवाने के लिए निकली थी। इस बीच पहले से घात में बैठे नक्सलियों ने हमलाकर 11 जवानों की हत्या कर दी।

   टाहमवाड़ा में 11 मार्च 2014 को नक्सली हमले में 16 जवान शहीद हो गए थे। उससे भी बड़ा हादसा 06 अप्रैल 2010 में ताड़मेटला में हुए हमले में 76 जवानों की मौत हो गई। और भी बहुत सारे हमले इन नक्सली इलाकों में आए दिन होते रहते हैं, और हमारे जवान मरते रहते हैं।

दंतेवाडा की हमलों पर एक नजर

     दंतेवाडा में 06 अप्रैल 2013 को सीआरपीएफ 62वीं बटालियन पर हुए नक्सली हमले में 73 जवान मरे थे। उसी तरह 17 मई 2010 में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग बनाकर हमला किया था जिसमें आदिवासी एस पी ओ समेत सीआरपीएफ के 36 जवान शहीद हो गए थे।

पिछले चार साल में देशभर में हुए नक्सली हमलों पर एक नजर

2013- 1136 हमले, 115 जवान शहीद, 282 नागरिक की मौत, 100 नक्सली ढेर

2014-1091 हमले, 88 जवान शहीद, 222 लोगों की मौत, 63 नक्सली ढेर

2015- 1089 हमले, 59 शहादत, 171 लोग मरे, 89 नक्सली ढेर

2016- 949 हमले, 63 जवान शहीद, 192 नागरिक की मौत, 193 नक्सली ढेर (स्रोतः लोस में प्रश्नोतर में गृह राज्यमंत्री द्वारी जारी ब्यौरा)

लेखक एवं प्रेषक — मो. तौहिद आलम पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

 

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