अपने वक्त के सबसे हैण्डसम अभिनेता थे विनोद खन्ना


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           हम  तुम्हें चाहते हैं ऐसे, जब कोई बात बिगड़ जाए, रोते हुए आते हैं सब, जैसे खूबसूरत गीतों में नजर आए बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता विनोद खन्ना अब हम सबकी आंखों को नम कर दुनिया से ओझल हो गए हैं। शायद ही ऐसा कोई हो, जो उन्हें न जानता हो। वह सभी के दिलों पर राज कर चुके हैं। वे कैंसर से पीड़ित थे। हाल ही में उनकी एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें वे बेहद कमजोर नजर आ रहे थे। विनोद खन्ना ऐक्टिंग के अलावा राजनीति में भी सक्रिय थे। उन्होंने मुंबई के रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में अंतिम सांस ली। उन्हें बीते 31 मार्च को मुंबई स्थित सर एच एन रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालांकि, अस्पताल की ओर से यही कहा गया था कि खन्ना के शरीर में पानी की कमी हो गई है। विनोद खन्ना ने दो शादियां कीं। पहली पत्नी गीतांजलि थीं, जिनसे 1985 में तलाक हो गया। बाद में उन्होंने कविता से शादी की। उनके तीन बेटे अक्षय खन्ना, राहुल खन्ना और साक्षी खन्ना हैं। उनकी एक बेटी है, जिसका नाम श्रद्धा खन्ना है।

      उन्हें मेरे अपने, मेरा गांव मेरा देश, इम्तिहान, इनकार, अमर अकबर एंथनी, लहू के दो रंग, कुर्बानी, दयावान और जुर्म जैसी फिल्मों में उनके अभिनय के लिए जाना जाता है। वह आखिरी बार 2015 में शाहरुख खान की फिल्म दिलवाले में नजर आए थे। उनका जन्म 1946 में पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था। 1960 के बाद की उनकी स्कूली शिक्षा नासिक के एक बोर्डिग स्कूल में हुई वहीं उन्होने सिद्धेहम कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक किया था। उन्होंने अपने फिल्मी सफर की शुरूआत 1968 मे आई फिल्म मन का मीत से की जिसमें उन्होने एक खलनायक का अभिनय किया था। कई फिल्मों में उल्लेखनीय सहायक और खलनायक के किरदार निभाने के बाद 1971 में उनकी पहली एकल हीरो वाली फिल्म हम तुम और वो आई। कुछ वर्ष के फिल्मी सन्यास, जिसके दौरान वे आचार्य रजनीश के अनुयायी बन गए थे, वर्ष 1997 और 1999 में वे दो बार पंजाब के गुरदासपुर क्षेत्र से भाजपा की ओर से सांसद चुने गए। 2002 में वे संस्कृति और पर्यटन के केन्द्रिय मंत्री भी रहे। सिर्फ 6 माह पश्चात् ही उनको अति महत्वपूर्ण विदेश मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया था। विनोद खन्ना अपने वक्त से सबसे हैण्ड सम अभिनेताओं में गिने जाते थे। उन्होंने कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों में काम किया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत नकारात्मक किरदारों से की। बाद में वह मुख्यधारा के हीरो बन गए। उन्होंने सुनील दत्त की 1968 में आई फिल्म मन का मीत में विलेन का किरदार निभाया। शुरुआत के दिनों में वह सह अभिनेता या विलेन के रोल में ही नजर आए। ये फिल्में थीं – पूरब और पश्चिम, सच्चा झूठा, आन मिलो सजन, मस्ताना, मेरा गांव मेरा देश, ऐलान आदि। 1977 में अमिताभ बच्चन के साथ की गई फिल्म परवरिश ने उन्हें बड़ा ब्रेक दिलाया। पहली बार इसी फिल्म से उन्होंने स्टारडम का स्वाद चखा। विनोद को 1971 में पहली सोलो लीड फिल्म हम तुम और वो मिली। बाद में गुलजार के मेरे अपने में शत्रुघ्न सिन्हा के अपोजिट निभाए गए उनके किरदार को आज भी लोग याद करते हैं। गुलजार की ही फिल्म अचानक में मौत की सजा पाए आर्मी अफसर का किरदार निभाने के लिए भी उन्हें काफी तारीफ मिली। बाद में अमिताभ के अपोजिट हेराफेरी, खून पसीना, अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकंदर में भी उन्होंने यादगार रोल निभाया। कहा जाता है कि अगर विनोद खन्ना ओशो के आश्रम न जाते तो आने वाले वक्त में वह अमिताभ बच्चन के स्टारडम को फीका कर देते। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि विनोद खन्ना की सबसे हिट फिल्मों में से एक कुर्बानी का रोल पहले अमिताभ बच्चन को ही ऑफर किया गया था। उन्होंने यह रोल ठुकरा दिया, जिसके बाद विनोद खन्ना ने यह किरदार निभाया। बाद में विनोद को रॉकी फिल्म ऑफर की गई, लेकिन उन्होंने यह फिल्म नहीं की। इस फिल्म से संजय दत्त ने बॉलीवुड में एंट्री ली। अपने अलग अंदाज और दबंग आवाज के लिए पहचाने जाने वाले विनोद खन्ना का निधन कला जगत के लिए एक अपूरनीय क्षति है। एक अभिनेता कभी नहीं मरता, वो सदैव प्रशंसकों के जेहन में जिंदा रहता है। भावभीनी श्रद्धांजलि।

 प्रेषक – देवेंद्रराज सुथार

 

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