सिनेमाघरों में राष्ट्रगान


      सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजने पर खड़ा होने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मैं पहली बार मूवी देखने गया था। जाता भी क्यों न आखिर अब तक की सबसे ब्लॉकबस्टर मूवी जो ठहरी बाहुबली। ऊपर से छुट्टी, फिर भला कोई कैसे खुद को रोक पाता। एक मई को श्रमिक दिवस के मौके पर मैं मेरे दो साथी और एक म्यूचल फ्रेंड यानी चार लोग मूवी देखने गए। हॉल में काफी भीड़ थी। कुछ लोग टिकट के लिए जद्दोजहद कर रहे थे, तो कुछ बाहर से ब्लैक में 50 की टिकट 100 और 70 की टिकट 150 में खरीद रहे थे। क्योंकि काउंटर पर कुछ दबंगों का कब्जा था। पहले तो हमने भी पैसा देकर ब्लैक टिकट लेनी की सोची। लेकिन बाद में ख्याल बदल दिया। हालांकि परिचय देने पर अगली शो की चार टिकट हमें अंदर से मिल गई, और फिर हम बाहर खड़े होकर लोगों की हुजुम को देखने लगे। इस से वक्त भी कट रहा था। जैसे-तैसे इंतजार खत्म हुआ, हॉल में हमलोगों ने प्रवेश किया और अपने निर्धारित सीट पर बैठ गए। पर्दा चालू होते ही कई फिल्मों के ट्रेलर और विज्ञापन दिखाए गए। लेकिन दिल तो बाहुबली के लिए मचल रहा था।

      पर्दे पर जैसे ही National Anthem(राष्ट्रगान) लिखकर आया, पूरा हॉल एकसाथ खड़ा हो गया। फिर राष्ट्रगान शुरू हुआ, और हम सब हाथ जोड़ खड़े हो गए। लेकिन यह सूनकर आश्चर्य लग रहा था कि राष्ट्रगान के दौरान भी हॉल में काफी शोर हो रहा था। इस शोर ने मेरा ध्यान सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले की ओर खींचा, जिसमें राष्ट्रगान के दौरान खड़े होने की सख्त हिदायत दी गई थी। फिर एहसास हुआ कि इसमें गलती उन लोगों की भी नहीं है जो हल्ला कर रहे हैं, बल्कि कहीं न कहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश में ही कुछ खामियां रह गई हो। क्योंकि कोर्ट ने अपने आदेश में यह जिक्र नहीं किया था कि आप उस समय शोर नहीं कर सकते, और फिर देशभक्त ठहरे भी पूरे देशभक्त। उन्हें तो उस फरमान को मानना है जो मिला है। शायद इसलिए भी सिनेमाघर में शोर हो रहा था। उसमें तो ऐसे लोग भी होंगे जो फेसबुक, वाट्सएप पर लंबा भाषण छोटा अनशन करते रहते हैं।

     मूवी देखने जाते समय मेरे दिमाग में फिल्म समीक्षा लिखने की बात चल रही थी। लेकिन इस घटना ने मेरा ध्यान दूसरी ओर आकर्षित कर दिया। ये सब इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि आजकल सोशल मीडिया पर एक अजीब तरह की बहस छिड़ी हुई है। कुछ तथाकथित देशभक्तों का कहना है कि कुछ लोग 52 सेकेंड राष्ट्रगान पर खड़े नहीं हो सकते तो हम उनकी 03 मिनट की आजान क्यों सूने। उनको बताना जरूरी है कि हम जितना सम्मान आजान की करते हैं उतना ही राष्ट्रगान और उतना ही भजन-कीर्तन का भी। खैर फिल्म देखते हुए मैं फिल्म का पूरा लुत्फ ले रहा था। उस समय मेरे मन में ना ही पीके चल रहा था र ना ही ओ माई गॉड। क्योंकि फिल्म एक मनोरंजन का साधन है, जिससे गाहे-बगाहे हमें अच्छी चीजें सीखने और जानने को मिल जाती है। तो मैं भी वहीं कर रहा था।

      कुछ लोग सोशल मीडिया पर फिल्म और कलाकारों का भी जातिकरण और राजनीतिकरण कर रहे हैं। बाहुबली की तुलना पीके से कर रहे हैं। क्योंकि उसमें एक्टर खान है, और इसे देवी-देवताओं का अपमान करार देते हुए आमिर को खरी-खोटी भी सुना रहे हैं। अब अगर ऐसे लोग सिनेमाघरों में फिल्म देखने जाए तो उनसे यह आपेक्षा नहीं कि जा सकती कि वो वाकई फिल्म का लुत्फ ले रहे हैं। उनके मन में आमिर खान की पीके और प्रभाष की बाहुबली के बीच तुलनात्मक लड़ाई चल रही होगी। कुछ तो इस चक्कर में भी दो-तीन शो देख आते होंगे कि बाहुबली की कमाई पीके से ज्यादा हो। एक बात और बताना चाहूंगा कि मैंने सिनेमाघर में आखिरी फिल्म धूम-3 और कृष-3 देखी थी। उस समय हमारा ग्रेजुएशन का इक्जाम खत्म हुआ था। खैर, वापस मुद्दे पर आते हैं। तथाकथित लोग पीके को भगवान का अपमान कहते समय भूल जा रहे हैं कि ओ माई गॉड में परेश रावल ने भगवान पर ही मुकदमा ठोक दिया था। दिलचस्प बात तो यह है कि वो मुकदमा जीत भी जाते हैं। आमिर की पीके को भगवान का अपमान बताने वाले ओ माई गॉड पे ऐसी चुप्पी साधे रहते हैं जैसे उन्होंने इस मूवी को देखा ही नहीं। मुझे किसी चीजों से आपत्ति नहीं होती। चाहे उसका किसी धर्म से लेना-देना हो। खैर फिल्म में कलाकारों पर अंगूली उठाने वाले भूल जाते हैं कि उस फिल्म की पटकथा अभिनेता ने नहीं निर्माता और निर्देशक ने तैयार की है। फिल्म मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक दोनों होती है। इसे देखते समय हमें अपने हमें अपनी इन पूर्वाग्रही सोचों से बाहर आने की जरूरत है। तब ही हम फिल्म का आनंद ले पाएंगे। वैसे मैं फिल्म को 4/4 स्टार देता हूं। फिल्म शुरुआत से अंत तक दर्शक को बांधने में सफल रहती है। चाहे वो देवसेना की इंट्री हो या नारियल के पेड़ को झुकाकर पहाड़ पर पानी और किला में बाहुबली सेना भेजने की कला। दृश्य देखकर ऐसा लग रहा था कि फिल्म हॉलीवूड को टक्कर दे रही है। फिल्म के संवाद, बनावट, सजावट और ऐतिहासिक दृश्य सब अपने- आप में अनोखे थे। फिल्म की किसी एक पहलू को इसकी सफलता का श्रेय देना फिल्म के साथ नाइंसाफी होगा।

 अंत में माननीय सर्वोच्च न्यायालय  से एक अनुरोध करता हूं, कि वो सिनेमाघर में राष्ट्रगान पर खड़े होने के साथ शोर-शराबा करने पर भी पाबंदी को तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश दें। अगर ऐसा नहीं होता है तो हर दिन सिनेमाघरों में चार बार राष्ट्रगान का अपमान होता रहेगा।

लेखक——मो. तौहिद आलम- पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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