व्यापार है या आजीवन कारावास !!!


   “व्यक्तिगत रूप से दुकान पर नियमित तौर पर बिना विराम के समय देने वाले दुकानदारो के लिए एक बात यह भी सोचने की है वह कौन सा समय होगा जब आप स्वयं भी दुनिया के समस्त मनोरंजन के भागीदार बन सकेंगे, हो सकता है आपका लक्ष्य कुछ लाख कमा लेने तक सीमित हो या फिर करोडपति बनने तक सीमित हो या बच्चों के बड़े हो जाने और कामयाब हो जाने तक आपने लक्ष्य निर्धारित किया हो. परन्तु क्या यह संभव होगा जब अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे तो व्यापार बंद कर सकेंगे या कुछ समय के लिए विराम दे पायंगे?”

    हमारे देश में पारम्परिक रोजगार के तौर पर कुटीर उद्योग,खेती बाड़ी,एवं दुकानदारी जैसे कार्य प्रचलन में रहे हैं.यद्यपि कुटीर उद्योग और खेती बाड़ी जैसे कार्यों की अपनी अपनी सीमायें है, प्रत्येक कार्य में अनेक प्रकार की परेशानियाँ है. एक तरफ परिवार के सभी लोगों के संलग्न होने के बावजूद ‘कुटीर उद्योग’ की कमाई बहुत ही सीमित होती है. खेती बाड़ी में बड़े खेत मालिकों को छोड़ कर सामान्य किसानों के लिये आज भी कठिन परिश्रम के पश्चात् भी सीमित साधनों के कारण मौसम का मिजाज उनके भविष्य और वर्तमान को प्रभावित करता है. उसकी खेती बाड़ी मौसम पर निर्भर होने के कारण अनिश्चितता उसे हमेशा व्यथित किये रहती है, साथ ही मार्किट से फसल का उचित मूल्य न मिल पाना भी किसान के हितों पर लगातार चोट करता है.यही हालात अनेक किसानों की आत्महत्या का कारण बन जाते हैं.

     उपरोक्त सभी कार्यों के अतिरिक्त पारंपरिक रूप में व्यापार अर्थात दुकानदारी भी रोजगार का मुख्य स्रोत रहा है. यहाँ पर यह कहना अनुचित नहीं होगा दुकानदारी किसी व्यक्ति या परिवार को निरंतर आमदनी का स्रोत होती है, आमद कम या अधिक हो सकती है. अब से पांच दशक पूर्व तक हमारी जीवन शैली सभी की एक जैसी होती थी,सभी लोगों जीवन स्तर(साधारण) समान ही होता था, सबकी इच्छाएं आकांक्षाएं सीमित होती थी. अतः दुकान की छोटी सी आमदनी पूरे परिवार को पालने में सक्षम थी. अतः घर के दो या तीन या अधिक सभी भाई एक दुकान से ही अपनी जीविका निर्वहन कर लिया करते थे. मिलजुल कर सब दुकान के कार्य को संभालते थे.अतः सभी परिजनों के व्यक्तिगत कार्य भी आवश्यकतानुसार हो जाया करते थे. अब जैसे जैसे औद्योगिक और सामाजिक विकास होता गया इन्सान की आवश्यकताएं बढती गयी और दुकान पर निर्भर सभी परिवारों का एक साथ निर्वहन आम्भव हो गया और घर के कुछ महत्वकांक्षी सदस्य अपना घर परिवार छोड़ कर रोजगार की तलाश में अन्य शहरों में स्थानांतरित हो गए. धीरे धीरे संयुक्त परिवार बिखरने लगे, दुकान को एक व्यक्ति ही सँभालने वाला रह गया अर्थात एक ही परिवार दुकान पर निर्भर हो गया. दुकानदारी एक ऐसा रोजगार है जिसे निरंतर समय देने की आवश्यकता होती है जितना अधिक समय उसे दिया जायेगा ग्राहक को अधिक सुविधाजनक होगा और दुकान की लोकप्रियता बढती जाएगी और आमदनी भी बढ़ेगी.

     अब एक दुकानदार, जो दुकान को अकेले ही संभालता है, उसके लिए समझने की आवश्यकता है की वह एक स्थान पर बैठा है जहाँ उसे अधिक से अधिक समय व्यतीत करना उसके व्यवसाय की आवश्यकता है,और परिवार की जिम्मेदारी भी उसी की है. अपनी घर की आर्थिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त बीबी बच्चों के प्रति भी अनेक दायित्व उसे निभाने होते हैं. उसका अपना  जीवन भी है जिसे वह प्रसन्नता के साथ व्यतीत करना चाहेगा उसके अपने तन और मन की भी कुछ  इच्छाएं और भावनाएं होती हैं, उसे इसी जीवन में अपने तन और मन की आवश्यकताएं भी इन चौबीस घंटों में से समय निकाल कर पूरी करनी होंगी. अब यह तुम्हारे ऊपर निर्भर है की तुम अपने जीवन को कैसे व्यतीत करना चाहते हो. दुकान को अधिकतम समय देकर धन एकत्र करना उचित होगा अथवा सीमित समय देते हुए अन्य सभी जिम्मेदारियों के लिए भी समय निकाल कर एक स्वस्थ्य जीवन जीना पसंद करेंगे. जिसमे परिवार के प्रति एवं अपने प्रति न्याय कर सकें.

मेरे कथन को निम्न लिखित कहानी से समझने में आसानी मिलेगी ;

    ” एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी❗गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी❗क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था❗गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी , कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा❗गिलहरी फिर काम पर लग जाती❗गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता, और वो फिर काम पर लग जाती❗ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था❗ऐसे ही समय बीतता रहा ….एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया❗गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के पूरी जिन्दगी काम करते – करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे, यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है,इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है,पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्यापार , और धन कमाने में बिता देता है. 60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है.तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है,परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है.

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये 

कितनी इच्छायें मरी होंगी,

कितनी तकलीफें मिली होंगी,

 कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे,

 क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक  बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके.”  

      यद्यपि कहना बहुत आसान होता है की दुकान पर सीमित समय बैठ कर व्यवसाय को चलाया जाना चाहिए  क्योंकि कारोबारी के समक्ष अनेक  चुनौतियाँ बनी रहती हैं.जैसे प्रतिद्वंद्वी के अधिक समय तक दुकान पर बैठने से ग्राहक का नुकसान झेलना पड़ता है, क्योंकि अक्सर दुकानदार की आदत होती है, वह जब दुकान को बंद करता है, जब उसका प्रतिद्वंद्वी बंद कर देता है या कर रहा होता है. इसी बहस के चलते सभी दुकानदार अपना व्यक्तिगत समय व्यर्थ करते रहते हैं. ताकि उसका ग्राहक  दुसरे दुकानदार के पास न पहुँच पाए.. इसी बहस में अनेक दिन,माह और वर्ष बीत जाते हैं,(सभी प्रकार के निजी कारोबारियों की विडंबना यही है.)यहाँ तक की उसका पूरा जीवन ऐसे ही बीत जाता है और उसे अपने लिए अपने परिवार के लिए कभी समय नहीं मिलता, उसे अपनी बींमारी के चलते भी  दुकान /कारोबार /व्यवसाय बंद रखना असंभव हो जाता है, परिवार में कोई बीमार होता है उसके इलाज के लिए भी उसे समय निकाल पाना सहज नहीं होता. कभी कभी समय के अभाव में उचित समय पर चिकित्सा सहायता न मिल पाने के कारण उसे किसी परिजन के जीवन से भी हाथ धोना पड़ता है. अपने लिए उसकी भावनाएं व्यर्थ हो जाती हैं. किस व्यक्ति का मन नहीं होता की वह कही घूमने फिरने के लिए समय निकाले,कभी ख़ुशी के कुछ क्षण अपने परिवार के साथ बिताये. सामाजिक कार्यों जैसे विवाह,जन्म,म्रत्यु एवं मनोरंजक कार्यक्रम, और आयोजनों में भाग ले सके, वह भी निश्चिन्त होकर. उसके मन के सारे अरमान दुकान की चार दीवारी में दफ़न हो जाते हैं जैसे उसे आजीवन कारावास की सजा मिली हो,उसके सभी परिजन मनोरंजन को स्वतन्त्र हैं परन्तु दुकानदार को तो अपनी डयूटी करनी है,और उसके पास कोई विकल्प नहीं है.

       यह भी एक विडंबना है अक्सर देखा तो यह भी गया है की दुकानदार को कभी यह अहसास भी नहीं होता की वह दुकानदारी के लिए समय व्यतीत करते हुए उसके जीवन में क्या कुछ अधूरा रह गया है. दुकानदारी का मूल मकसद क्या होता है अर्थात दुकानदारी एक जीवन नहीं है, वह सिर्फ एक माध्यम है अपनी और अपने परिवार की आर्थिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने का एक माध्यम मात्र है. परन्तु आर्थिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त भी जीवन को बहुत कुछ चाहिए होता है.कभी कभी किसी कारण मार्किट की हड़ताल होने पर दुकानदार खाली समय का सदउपयोग भी नहीं करना चाहते वे अपना सभी समय दुकान के आस पास साथियों के साथ गप शप में व्यतीत कर देते हैं,मानो जैसे उनका जन्म ही दुकान पर बैठने के लिए हुआ है उसके अतिरिक्त उनका कोई जीवन है ही नहीं, घर परिवार की खुशियाँ सिर्फ धन उपलब्ध कराने तक सीमित हैं. वे घर तो सिर्फ भोजन करने और सोने के लिए जाते हैं बच्चे भी उन्हें रात के डैडी कहते हैं,शायद वे पिता को, और पत्नी अपने पति को एक धन कमाने की मशीन के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते. उनकी सोच भी परिस्थितियों के अनुसार ढल जाती है जब भी उन्हें कोई मनोरंजन करना होता है, उस समय घर का मुखिया (पिता या पिता—-दुकानदार) साथ होना, उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखता. अतः दुकानदार का परिवार भी अपने मनोरंजन में व्यस्त रहता है परन्तु दुकानदार का अस्तित्व सिर्फ परिवार को धन उपलब्ध कराने तक सीमित हो जाता है.जैसे वह कोई रोबोट हो जिसकी अपनी  इच्छाएं और भावनाएं होती ही नहीं .दुकानदार का बेटा उचित संरक्षण और प्यार के अभाव में गलत संगत में पड़ सकता है, बेटी उचित दिशा निर्देशों के अभाव में गलत हाथों में पड़ सकती है,बच्चों को सिर्फ माँ का प्यार ही नहीं एक पिता का प्यार और सानिध्य भी चाहिए होता है, जिसके अभाव में संतान का भविष्य अनुचित दिशा में चला जा सकता है,और बेटे के बिगड़ जाने का अर्थ होता है,आपका परिश्रम से कमाया धन भी व्यर्थ हो सकता है. कहने का तात्पर्य यह है की दुकानदार का परिवार उसका सानिध्य भी चाहता है.एक दुकानदार का कर्तव्य भी है की वह अपने बच्चों के विकास और दिशा निर्देशन के लिए समय निकले,दुकान के कार्य और परिवार के लिए समय का संतुलन बनाये, ताकि उसका भविष्य, उसके बच्चों का भविष्य भी सुखद हो सके.

      एक बात यह भी सोचने की है वह कौन सा समय होगा जब आप स्वयं भी दुनिया के समस्त मनोरंजन के भागीदार बन सकोगे, हो सकता है आपका लक्ष्य कुछ लाख तक सीमित हो या फिर करोडपति बनने तक सीमित हो या बच्चों के बड़े हो जाने और कामयाब हो जाने तक आपने लक्ष्य निर्धारित किया हो. परन्तु क्या यह संभव होगा जब अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे तो व्यापार बंद कर सकेंगे या कुछ समय के लिए विराम दे पायंगे? क्या संतान के पढ़ लिख कर कामयाब होने के पश्चात् आप व्यापार से मुक्त हो पायंगे,या किसी एक बेटे को अपने साथ लगा लेने के पश्चात् आप स्वतन्त्र जीवन जी सकेंगे अपने शौक पूरे कर सकेंगे? यदि आप ऐसा सोचते हैं तो यह आपका भ्रम है.शायद उम्र के ढलते पड़ाव पर आपकी इच्छाएं भावनाएं,आपका उत्साह ही समाप्त हो चुके हों,या शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके हो. अधिक धनवान होने की चाहत में आपके अथक प्रयासों से जैसे जैसे आपका व्यापार बढ़ता है आपका लालच और आपका व्यापार से संलग्नता का समय बढ़ता जायेगा. यह भी निश्चित है. यदि आप करोडपति भी हो जायेंगे तो थी दुनिया में सर्वसुविधा संपन्न नहीं हो सकते अर्थात दुनिया में अमीरी के शिखर पर नहीं पहुँच सकते, यह तो पक्का है. तो फिर क्यों व्यापार में असीमित समय देकर अपने जीवन को बर्बाद करना. क्या उसके लिए आपको दोबारा  जीवन उपलब्ध हो पायेगा? यहाँ मेंरे कहने का तात्पर्य है की व्यापार को एक सीमा तक समय दें,नियमित रूप से समय दें.एक निश्चित समय पर उपस्थिति निश्चित करें ताकि ग्राहक आश्वस्त रहे आपकी दुकान अमुक समय खुलती है.चाहे उसका समय कम ही क्यों न हो,आकस्मिक अवकाश कम ही करें,सप्ताह में एक बार अवकाश अवश्य रखें,त्यौहार के अवसरों पर यथा संभव परिवार के साथ खुशियाँ मनाएं यदि आपका व्यापार त्यौहार से सम्बंधित है तो पहले कमाई करें फिर त्यौहार के पश्चात् परिवार के साथ समय बिताएं. किसी अन्य की नक़ल न करें आपका जीवन सिर्फ आपका है.

     कुछ कारोबार ऐसे भी होते हैं जिनमे दुकानदार को अट्ठारह से बीस घंटे देने पड़ते हैं जैसे दूध की डेरी,मेडिकल स्टोर,हलवाई(मिठाई-नमकीन कारोबार),कन्फेक्शनरी या परचून की दुकान, ऐसे दुकानदारों को भी ऐसा समय चुनना होगा जब दुकान पर ग्राहक कम होता है या नहीं होता है, ऐसा समय चुन कर दुकान को कुछ समय विराम देना चाहिए.और अपने व्यक्तिगत एवं परिवार के कार्यों को पूरा करना चाहिए.बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए.यदि इतने भाग्य शाली हैं की आपके परिजन भी आपके व्यापार में सहयोग देते है अथवा पार्टनर है,ऐसे सुखद स्थिति में प्रत्येक पार्टनर या सहयोगी को बारी बारी से कार्य मुक्त करना चाहिए ताकि व्यापार भी चलता रहे और प्रत्येक सदस्य को जीवन की गुणवत्ता भी प्राप्त होती रहे.वर्ष में कम से कम प्रत्येक पार्टनर को दस पंद्रह दिन का अवकाश देकर कही भ्रमण करने का अवसर देना चाहिए.

        यदि आप गंभीरता से सोचें तो आप अनुभव कर सकते है व्यापार के नाम पर आजीवन कारावास भुगत रहे हैं, शायद उससे भी अधिक क्योंकि आजीवन कारावास भी बीस वर्ष से अधिक नहीं होता,दुकान पर ड्यूटी तो जीवन भर निभानी पड़ेगी. अतः एक व्यापारियों ,दुकानदारों, को जागरूक करने के लिए उसके हितों को समर्पित एक प्रयास. इस विषय से सम्बंधित आपके मन में कोई भी प्रश्न हो तो अवश्य मुझसे मेल द्वारा संपर्क कर सकते हैं…

 मेरा मेल आई डी है—-satyasheel129@gmail.com    

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