क्या है इंसानियत का धर्म


               {सभी धर्मों का सार है ‘इंसानियत’। दूसरे अर्थों में सभी धर्मों का मूल उद्देश्य है मानव को अपने समाज में, दुनिया में कष्टहीन एवं शांतिपूर्ण जीवन जीने का वातावरण प्रदान करना। सभी धर्मों का उद्भव मानव कल्याण के लिए हुआ है। किसी भी धर्म का पालन करने का तात्पर्य है अपने व्यवहार को समाज के अनुकूल बनाना अर्थात इंसानियत के गुणों का विकास करना। यदि कोई व्यक्ति मन्दिर में घंटे बजाकर, पूजा, आरती करके या मस्जिद में नमाज अदा कर, अपने व्यवहार में शालीनता, ईमानदारी, सच्चाई के गुण उत्पन्न नहीं कर पाया तो वह अपने धार्मिक उद्देश्य को ही खो देता है।}

       प्रत्येक मानव, (जो एक जानवर का ही संवर्धित रूप है)के भीतर इंसान और शैतान मौजूद होता है। विश्व में विद्यमान सभी धर्मों का मूल उद्देश्य मानव के शैतान को नष्टकर उसके इंसान को जागृत करना है परन्तु विडम्बना यह है धर्म के नाम पर उसके मूल स्वरूप इंसानियत को भूल जाते हैं। परिणामस्वरूप अपने धर्म, धारणाओं के प्रति कट्टर होकर अन्य धर्मों अर्थात धर्मावलम्बियों पर कुठाराघात करने लगते हैं। इंसानियत को भूलकर अपने धर्म की सेवा का श्रेय लेने वाला वास्तव में अपने धर्म की सेवा नहीं कर रहा है बल्कि अपने धर्म के मूल उद्देश्य से भटककर अधर्म, असामाजिक कार्य कर रहा होता है। उसको धार्मिक व्यक्ति कहना भी असंगत होगा।9 007

          सभी धर्मों का सार है ‘इंसानियत’। दूसरे अर्थों में सभी धर्मों का मूल उद्देश्य है मानव को अपने समाज में, दुनिया में कष्टहीन एवं शांतिपूर्ण जीवन जीने का वातावरण प्रदान करना। सभी धर्मों का उद्भव मानव कल्याण के लिए हुआ है। किसी भी धर्म का पालन करने का तात्पर्य है अपने व्यवहार को समाज के अनुकूल बनाना अर्थात इंसानियत के गुणों का विकास करना। यदि कोई व्यक्ति मन्दिर में घंटे बजाकर, पूजा, आरती करके या मस्जिद में नमाज अदा कर, अपने व्यवहार में शालीनता, ईमानदारी, सच्चाई के गुण उत्पन्न नहीं कर पाया तो वह अपने धार्मिक उद्देश्य को ही खो देता है।धर्म की वास्तविक सेवा करने के लिए क्रूरता, कुटिलता, धोखाधड़ी जैसे अवगुणों को बाहर निकाल फेंकना अत्यंत आवश्यक है। धर्म के नाम पर हिंसा करने वाला अपने धर्म के साथ विश्वासघात तो करता ही है, इंसानियत का भी दुश्मन है। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी धर्म को अपनाये सिर्फ ‘इंसानियत’ का आचरण करता है तो वह उस धर्म पालक से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति है जो धर्म का पालन तो करता है, भक्ति तो करता है परन्तु इंसानियत के दायरे में नही रहता है, हिंसा, धोखाधड़ी, बेईमानी जैसे कर्मों को अंजाम देता है। उसका धर्म अनुयायी होना सिर्फ दिखावा है अपने आपको धोखा देना है। इसी प्रकार आतंकवादी भी धर्म का सहारा लेकर जनता को मूर्ख बनाकर अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। आतंकवादी जो इंसानियत के दुश्मन हैं किसी धर्म के सेवक कैसे हो सकते हैं? ‘इंसानियत’ जहाँ नैतिक मूल्यों को मान्यता देती है, मानव समाज को शांतिपूर्वक जीने के साधन उपलब्ध कराती है और अन्याय, अत्याचार, मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाती है। परिवार व समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम उपलब्ध कराती है। ‘इंसानियत’ सभी धर्मों को एक सूत्र मे पिरोने वाला  धर्म है। क्योंकि सभी धर्मों का सार भी इंसानियत ही है।प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म की परिभाषा अपनी रुचि के अनुरूप कर लेता है, भले ही धर्म ग्रन्थों में वर्णित तथ्यों का औचित्य ही लुप्त हो जाये। अतः तोड़-मरोड़कर अपनी रुचि के अनुसार आचरण को मान्यता देने से धर्म का वास्तविक उद्देश्य नहीं बदल सकता। वर्तमान में बढ़ रहे अनाचार का कारण भी धर्म ग्रन्थों के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना है।

क्या है इंसान और हैवान में फर्क

अब समझते हैं क्या अन्तर है एक इंसान (मानवतावादी) और हैवान में, जो है तो इंसान ही, मनुष्य ही, परन्तु इंसान के हितों के विरूद्ध जाकर अपना हित साधन करता है।

  यदि कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए किसी अन्य व्यक्ति को प्रताड़ित करता है, कष्ट पहुंचाता है, हिंसक व्यवहार करता है, मानसिक यातना देता है, अपने मनोरंजन के लिए किसी की मूल आवश्यकताओं से उसे वंचित करता है, हैवान की श्रेणी में आता है। ऐसा व्यक्ति मनुष्य, मानव, इंसान होते हुए भी हैवान है। मानवीय गुणों से दूर है। वह दूसरे के कष्ट को कष्ट न मानकर अपने स्वार्थ में अपने लिए जीना जानता है। उसे समाज के नियम, कानूनों का ख्याल नहीं होता। वह अपने को इतना शातिर, चतुर, चालाक मानता है समाज और देश के कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते अतः बेखौफ होकर अपराध करता है। ऐसे हैवान व्यक्ति युगों-युगों से समाज में अशान्ति फैलाते आये हैं, अत्याचार, दुराचार, अपराधों से समाज को व्यथित करते रहते हैं। आज विश्वव्यापी आतंकवाद भी ऐसे हैवानों के समूह द्वारा प्रायोजित हिंसा का रूप हैं जो सर्वाधिक घिनौने रूप में हमारे जीवन को कलुषित कर रहा है। ऐसे लोगों के व्यवहार को एक जानवर से भी बदतर माना जा सकता है। क्योंकि हैवान मानव होने के कारण मस्तिष्क का उपयोग कर योजनाबद्ध और विकसित रूप से समाज को हानि पहुँचाते रहते हैं। अपने आर्थिक लाभ के लिए अनैतिक, अवैध कार्य करते हैं। विभिन्न धर्मों का मुख्य कार्य है मानव मन में उपस्थित हैवान को मार दें, मृत प्रायः कर दें और इंसानियत का भाव जगा दे। मानव यदि इंसान बनकर रहता है तो वह दयालू, हितकारी, परोपकारी, विकास में सहायक सिद्ध होता है।

       समाज की उन्नति का कारण बनता है, परन्तु हैवान मानव मात्र का दुश्मन होता है, उसका जीवन समाज के लिए बोझ एवं पीड़ादायक होता है। ‘इंसानियत’ ही देश, समाज, विश्व की उन्नति में सहायक होती है। इंसान ही अपने परिवार, समाज, देश और विश्व का निर्माण कर सकते हैं। मनुष्य जाति को सुविधाएँ उपलब्ध करा सकते हैं। दूसरी तरफ हैवान सिर्फ विध्वंस ही कर सकता है। विकास की गति को उल्टी दिशा देता है। अतः मानव विकास, विश्व शांति के लिए हैवानियत का अंत कर इंसान (मानवता) और इंसानियत का परचम लहराना मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। अन्त में बाबा ने अपने शिष्यों से कोई प्रश्न पूछने का आग्रह किया। जब दोनों चेलों ने अपना कोई प्रश्न न करने को कहा तो बाबा ने अगला विषय प्रारम्भ कर दिया।

क्या है एक हैवान और जानवर में अन्तर

  मानव और जानवर में विशेष अन्तर उनके बौद्धिक स्तर का होता है। बौद्धिक स्तर के कारण मानव को कानून बनाकर अवांछनीय कार्यों से रोका जा सकता है अथवा एक अपराधी को सजा देकर अन्य सभी मनुष्यों को अपराधिक कार्य करने से रोकने का प्रयास किया जाता है और व्यवस्था बनी रहती है। परन्तु जानवर सिर्फ डंडे की भाषा समझ पाता है अर्थात हमेशा डंडे से प्रहार कर ही वह नियन्त्रित रह सकता है। परन्तु यदि वह डंडे से नियन्त्रित नहीं होता और मानव के लिए घातक है तो मार डालना ही उपाय बचता है।  हैवान एक मानव होते हुए भी जानवर ही है। जिसे भी डंडे की भाषा समझ आती है। वह स्वतन्त्र रूप से रहते हुए समाज का अहित ही करता रहता है। अतः जेल में रखकर ही उसकी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाता है। यदि अपराधी पकड़ा न जा सके तो उसे एनकाउंटर कर देना ही समाज हित में होता है। शासक को जनता को अपराध मुक्त रखने के लिए ऐसे अपराधियों को समाप्त कर देना मजबूरी हो जाती है।क्योंकि हैवान एक मानव के रूप में जानवर है अतः वह दिमाग का प्रयोग कर समाज में अशांति उत्पन्न करता है। इसी दिमाग के प्रयोग के कारण वह जानवर से भी अधिक खतरनाक साबित होता है क्योंकि वह जानवर से अधिक नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। वह आधुनिक हथियारों का प्रयोग कर मानवता का खून करता है। अतः जानवर को सिर्फ डंडे के बल पर अथवा साधारण हथियारों से नियंत्रित किया जा सकता है परन्तु हैवान को हथियार के साथ-साथ अतिरिक्त बुद्धि प्रयोग से हैवान की बौद्धिक चालों को काटना होता है। उसके दिमाग से अधिक बुद्धिमत्ता द्वारा ही उस पर नियंत्रण करना होता है अन्यथा हैवान दीमक की भांति समाज को खोखला करते रहते हैं। यह भी सत्य है की कोई भी व्यक्ति हैवान का चरित्र लेकर पैदा नहीं होता। पैदा होने वाला मानव शिशु उस गीली मिट्टी के समान होता है जिसे किसी भी रूप में ढाला जा सकता है। अब कुम्हार उस मिट्टी से प्यास बुझाने के लिए पानी पीने का कुल्हड़ भी बना सकता है अथवा बम अथवा अनार की आतिशबाजी में काम आने वाला खोल। शिशु का पालन पोषण किन परिस्थितियों में हुआ है प्यार, दुलार, दुत्कार, उपेक्षा, आर्थिक अभाव, कलंकित इतिहास अथवा सम्मानित जीवन सभी कुछ मानव के भावी जीवन पर प्रभाव डालते हैं। अभिभावकों का चरित्र एवं उनकी देखभाल करने की योग्यता ही मानव शिशु को इंसान या हैवान का रूप देती है।अतः यदि  इन्सान का बचपन में पालन पोषण उचित दिशा में किया जाय और उसे अच्छा वातावरण उपलब्ध कराया जाय तो उसे हैवान होने से रोका जा सकता है  उसका मानसिक और शारीरिक विकास कर सभ्य नागरिक बनाया जा सकता है,इस प्रकार से समाज में शैतानों की उत्पत्ति पर  अंकुश लगाया जा सकता है.

               निष्कर्ष स्वरूप हैवान को नियंत्रित करना जानवर के मुकाबले अधिक कष्ट साध्य है। क्योंकि हैवान मानव समाज का हिस्सा है। समाज में उत्पन्न होता है। अतः इसे नियन्त्रित करना आवश्यक ही नहीं, चुनौती भी है।

 क्यों है इंसानियत की आवश्यकता?

           हम सभी के मन में प्रश्न उठता है, क्यों आवश्यक है मानव को इंसानियत के दायरे में रहने की? ऐसी क्या मजबूरी है उसे नियम, कायदे, कानूनों में बंधकर रहने की। क्यों सोचना पड़ता है उसे ‘इंसानियत’ के लिए। क्या यह सम्भव नहीं कि वह स्वतन्त्रता रूप से विचरते हुए अपनी इच्छानुसार कार्यकलाप को अंजाम दे। जैसे अन्य जीव जन्तुओं की स्थिति है। उन पर कोई कायदा कानून लागू नहीं होता।

          वास्तव में जानवरों एवं जीव जन्तुओं में बुद्धि के अभाव में सिर्फ डंडे की भाषा मान्य है। डंडा अथवा बल प्रयोग ही उनका पहला और आखिरी नियम है। अतः डंडे के इशारे पर चलाना ही उन्हें अनुशासित रख सकता है परन्तु मानव एक बुद्धिजीवी, महत्वाकांक्षी प्राणी है। इसलिए वह निरंतर अपने जीवन स्तर को उठाने और सुख सुविधाएँ अधिक से अधिक जुटाने के लिए प्रयासरत रहता है। मानव की इन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उसे समूह, समाज में रहना आवश्यक है। बिना समाज के मानव उन्नति असम्भव है। स्पष्ट है मानव को अपनी उन्नति करने के लिए समाज के साथ, समाज के लिए जीना पड़ता है। स्वतंत्र रूप से वह अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। क्योंकि समाज में इंसान एक-दूसरे के हितों से अत्यधिक जकड़ा हुआ है।

         कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से समाजविहीन रहना चाहे तो सम्भव ही नहीं है। क्योंकि यदि कोई खेतीबाड़ी कर अनाज पैदाकर लेगा तो तिलहन, दलहन, फल, सब्जी आदि के लिए अन्य किसानों से लेन-देन करना पड़ेगा। उसके पश्चात् उसे अन्य आवश्यक वस्तुएँ जैसे कपड़ा, मकान, साबुन, शुद्ध पानी इत्यादि अनेक वस्तुएँ उसे समाज से लेन-देन कर प्राप्त करनी हांेगी और तो और अपनी खेतीबाड़ी के लिए कृषि औजार, खाद, बीज, कीटनाशक अनेकों वस्तुओं को पाने के लिए फिर समाज का मुंह देखना होगा। अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति, मनोरंजन के लिए परिवार की भी आवश्यकता होगी। जो समाज की छोटी इकाई है। आप चन्द रुपये व्यय कर टेलीविजन, मोबाइल, गैस चूल्हा, गैस पुस्तक, वाहन इत्यादि प्राप्त कर सकते हैं जिन्हें उत्पादित करने के लिए विपुल सम्पदा की आवश्यकता होती है। अर्थात सिर्फ एक व्यक्ति सिर्फ ‘एक वस्तु’ उत्पादित कर ही नहीं सकता, इसी प्रकार उत्पादक बिना समाज के सहयोग के अपनी उत्पादित वस्तुओं से लाभ नहीं कमा सकता उसे उपभोक्ता का एक बड़ा वर्ग चाहिये होता है अन्यथा उसके कारखाने में बनी वस्तु अत्यधिक महंगी होने के कारण बिक नहीं सकेगी और उद्योगपति कमाने की स्थिति में नहीं होगा और उपभोक्ता उस वस्तु का उपभोग नहीं कर सकेगा। अतः समाज का प्रत्येक व्यति और उद्योगपति एक-दूसरे पर निर्भर हैं, एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्व सम्भव नहीं है। यही कारण है बड़े कारखाने की सफलता भी बड़े ग्राहक संख्या पर निर्भर होती है। बड़े कारखाने के लिए बड़ी पूँजी की आवश्यकता पूर्ति भी समाज से ही सम्भव है। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव मानव के साथ, समाज के साथ, देश और विश्व के साथ उलझा हुआ है, जकड़ा हुआ है, बंधा हुआ है। अतः पूरे विश्व के साथ व्यवहार करना, व्यवहार रखना उसके विकास के लिए वर्तमान समय की आवश्यकता है। अतः मानव समाज से व्यवहार के लिए परस्पर हितों का ध्यान रखना आवश्यक है।   इसी व्यवहार को सुचारू रूप से निभाने के लिए ‘इंसानियत’ की आवश्यकता होती है। ‘इंसानियत’ अर्थात कुछ ऐसे नियमों के अन्तर्गत स्वयं को बांधना जो सभी को स्वीकार्य हों, सभी के हितों के पक्ष में हों, आवश्यक हो जाता है ताकि मानव सुरक्षित, शान्तिपूर्ण वातावरण में उन्नति कर सके उसमें ही उसका और पूरे मानव समाज का लाभ निहित है, कल्याण सम्भव है। इंसानियत अर्थात सभ्यता भी स्वयं एक विकास का परिचायक है। बिना सभ्यता के, बिना इंसानियत के, सारे विकास, सारे अन्वेषण, सारी उन्नति बेमाने हैं।

         चन्द शब्दों में यदि कहा जाये तो ‘इंसानियत’ ‘इंसानियत का धर्म’ मानव समाज को निरंतर विकास पथ पर ले जाने का आवश्यक माध्यम है। वर्तमान परिपेक्ष्य में बिना इंसानियत अपनाये, मानव विकास की कल्पना निरर्थक है।

 

 

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