वृद्धावस्था में एकाकीपन 


        यह  तो कटु सत्य  है  की  प्रत्येक  इन्सान  को  मौत  आनी  है ,परन्तु  यह  भी  सत्य  है  ऐसा  कोई  निश्चित  नहीं  है  की  पति और  पत्नी  एक  साथ  दुनिया  से  विदा  लें, अर्थात  दोनों  की  मृत्यु  एक  समय  पर  हो. किसी  एक  को  पहले  जाना  होता  है . दाम्पत्य  जीवन  में  अकेला  रहने  वाला  व्यक्ति  एकाकी  पन का  शिकार  होता  है . किसी  भी  व्यक्ति  को  अपने  जीवन  साथी  की  सबसे  अधिक  आवश्यकता  प्रौढ़  अवस्था  में  होती  है . प्रौढ़ावस्था  में  अपने  विचारों  के  आदान   प्रदान  का  एक  मात्र  मध्यम  जीवन  साथी  ही  होता  है . प्रौढ़ावस्था  में  बीमारी  एवं  दुःख  दर्द  में  सेवा , सहानुभूति, सहयोग  मुख्यतः  जीवन  साथी  से  प्राप्त  होता  है .प्रौढ़ावस्था  आते  आते  अपने  अनेकों  मित्र एवं   संगी  साथी , बिछड़  चुके  होते  हैं . अथवा  इस  अवस्था  में  होते  हैं  की  वे  आपस  में  मिल  नहीं  सकते  अथवा  विचार  विनिमय  नहीं  कर  पाते ,कारण  आर्थिक  भी  हो  सकता  है . शारीरिक  अक्षमता भी हो  सकता  है  अथवा  अन्य  परिस्थितियां . यह  इंसानी   स्वभाव  है  की  वह अपने  आयु  वर्ग  के  साथ  ही  भावनाओं  का  आदान   प्रदान  करने  ,विचार  विनिमय  करने  तथा  उसके  साथ  समय  व्यतीत  करने  में  सर्वाधिक  सहज  अनुभव  करता  है .इसलिए  प्रौढ़ व्यक्ति  को  भी  अपनी  भावनाएं  व्यक्त  करने  के  लिए  वृद्ध  व्यक्ति  ही  चाहिए . उसका  बेटा ,बेटी  अथवा  कोई  अन्य  परिजन  उसके  लिए  संतोष  जनक  व्यक्ति  साबित  नहीं  हो  सकता . अतः  जीवन   साथी  का  बिछडाव  व्यक्ति  की  जीवन  संध्या  का  अंतिम  अध्याय  बन  जाता  है . एकाकी  पन  उसे  मौत  की  प्रतीक्षा  के  लिए  प्रेरित  करने  लगता  है . इसी वजह से समाज में एक नया रिश्ता उभर कर आया है जिसे कहते है ‘वृद्धावस्था में लिव इन रिलेशनशिप’.  जिससे दो ऐसे वृद्ध व्यक्ति जो अपने जीवन में जीवन साथी से बिछड़ गए हैं, उन्हें ‘वृद्धावस्था में लिव इन रिलेशनशिप’.  में आ जाने से अपने शेष जीवन संतोषजनक ढंग से जीने का मकसद मिल जाता है और परिवार के लिए भी संतोष प्रद साबित होता है.

     यदि  घर  में  नाती  पोते  बाल्यावस्था में  हैं  तो  अवश्य  उसका  मन बहलाने  एवं  समय  बिताने  का  अवसर  मिल  जाता  है . यदि  प्रौढ़  स्त्री  है  तो   उसका  एकाकीपन  कम  व्यथित  करता  है .क्योंकि  उसका  कार्यक्षेत्र घर परिवार  का  कामकाज  ही  रहा  है  .अतः  अपनी  क्षमतानुसार  घरेलु  कार्यों  में  समय  व्यतीत  कर  सकती  है . परन्तु  प्रौढ़  पुरुष  के  लिए ऐसा  संभव  नहीं  होता . उसका  एकाकीपन  उसके  जीवन  को  नीरस  कर  देता  है .उसके  लिए  प्रत्येक  दिन  पुरानी  यादों  का  पिटारा  खोल  कर  दुःख  के  अतिरिक्त  कुछ  नहीं  दे पाता .

   बुजुर्ग व्यक्ति कितनी भी अधिक प्रतिरोधक क्षमता रखता हो जब उसके समक्ष उसके साथी दुनिया छोड़ जाते हैं तो उसके लिए जीवन कठिन हो जाता है,परन्तु उसे सर्वाधिक कष्ट जब होता है जब परिवार का कोई व्यक्ति अर्थात बेटा या बेटी या उसके समकक्ष अचानक दुनिया से विदा हो जाता है.इस आघात को सहना उसके लिए असंभव हो जाता है, उसका स्वास्थ्य निरंतर गिरने लगता है और वह मौत की ओर अपने कदम बढ़ा लेता है.

         जीवन  साथी  का  अभाव तो अधेड़ावस्था में  हो अथवा  प्रौढ़ावस्था  में  हो किसी  भी  व्यक्ति  के   जीवन  को  संकुचित  कर  देता  है .वह  अपेक्षतया शीघ्र मौत  को  गले  लगा  लेता  है .

 

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