अटल जी एक अनोखा व्यक्तित्व


      भूत पूर्व प्रधानमंत्री नहीं बल्कि अभूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी अब हमारे बीच नहीं रहे, बाजपेयी जी के देहांत से पूरे देश को उद्वेलित हो गया है. वे एक अच्छे कवि के साथ साथ  ऐसे राजनेता थे जो सत्ता में रहते हुए भी विरोधी पक्ष में लोकप्रिय थे.  क्योंकि वे जब सत्ता में नहीं थे तो भी सत्ता पक्ष का विरोध हमेशा सकारात्मक होकर ही किया.यदि उन्हें सत्ता पक्ष की नीतियों में तार्किक रूप से कहीं कोई त्रुटी दिखाई देती थी,या जनता के हितों को चोट पहुँचने का अंदेशा  होता था, तब ही विरोध में अपनी आवाज बुलंद करते थे. परन्तु सरकार द्वारा उठाये जाने वाले जनउपयोगी क़दमों का स्वागत भी करते थे.उनका  उद्देश्य सिर्फ विरोध करने के लिए ही विरोध करना नहीं होता था, सकारात्मक विश्लेषण द्वारा ही आपतिजनक कार्यों के विरुद्ध ही अपनी आवाज बुलंद करते थे.इसी कारण सत्तापक्ष भी उनके वक्तव्यों पर  गंभीरता से विचार करता था,मानना या न मानना उनके अपने स्वार्थ पर निर्भर होता था. बाजपेई जी  जब भी सदन में बोलना शुरू करते  थे तो उनके सार्थक तर्कों से बड़े से बड़े नेता की बोलती बंद हो जाती थी.

ABP

     पूरा देश आज उनका कर्जदार है, जिनके द्वारा स्थापित भारतीय जनता पार्टी एवं उसकी विचार धारा,देश की सत्ता पर अनेक दशकों से  काबिज कांग्रेस का मजबूत विकल्प बन कर उभरी है, और उनके द्वारा स्थापित पार्टी ने देश को कांग्रेस के भ्रष्ट शासन से मुक्ति दिलाई. उनके द्वारा स्थापित पार्टी ने देश को मोदी जी जैसा जुझारू, ईमानदार एवं कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति को देश का नेतृत्व प्रदान करने के लिए आगे बढाया. जिन्होंने देश की तीव्र प्रगति को एक दिशा प्रदान की,और भ्रष्टचार मुक्त शासन देने का सफल प्रयास किया है. उन्होंने गत साठ वर्षों में हुए विकास कार्यों से अधिक अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में करने का प्रयास किया है और सफलता भी पाई है. विश्व पटल पर देश को और देश की जनता को सम्मान दिलाया.

    यद्यपि अटल जी ने अपने कार्यकाल में भी देश हित अनेक कार्यों को प्रारंभ किया जैसे किसान क्रेडिट कार्ड योजना का लागू करना, समस्त देश को हाईवे से जोड़ने का अभियान चलाना, पूरे देश में नदियों को एक अंतरजाल के अंतर्गत जोड़ कर प्राकृतिक संसाधनों का अधिक से अधिक दोहन करना इत्यादि योजनाओं द्वारा देश की आधारभूत संरचना को मजबूत करना उनके मुख्य उद्देश्यों में था. देश में सुशासन की स्थापना,परमाणु विस्फोट जैसा फैसला लेकर पूरी दुनिया में अपनी दृढ इच्छा शक्ति का परिचय देना,कारगिल युद्ध में दुशमन को धूल चटाना अटल जैसे व्यक्ति के नेतृत्व में ही संभव था. तेरह विभिन्न विचार धारा की पार्टियों को साथ लेकर सरकार को पूरी अवधि तक चलाना सिर्फ अटल जी द्वारा ही संभव था. उन्होंने प्रथम बार देश में किसी गैर कांग्रेसी सरकार को वह भी गठबंधन सरकार को  पूरे पांच वर्ष तक चला कर  भारतीय इतिहास में रिकॉर्ड स्थापित किया. जो उनके लोकप्रिय व्यक्तित्व द्वारा ही संभव हो पाया.

    अटल जी पहले जनसंघ से जुड़े नेता थे जिसका विलय 1977 में जनता पार्टी में हो गया.तत्पश्चात 1980 में भारतीय जनता पार्टी के नाम से प्रथक पार्टी का गठन किया.1990 तक संसद में दो सांसद के साथ आगे बढ़ने वाली पार्टी 1914 तक अपने बल पर स्पष्ट बहुमत पाने वाली पार्टी बन गयी.यह अटल जी के अथाह परिश्रम और दूरदर्शिता का ही परिणाम था. उन्होंने कभी भी नकरात्मक राजनीति कर सत्ता पक्ष का विरोध नहीं किया.यदि उन्हें सरकार का कोई  कार्य जनहित में प्रतीत हुआ तो उसका खुल कर समर्थन करते थे या प्रशंसा करता थे. वे आज की विरोधी पार्टियों की भांति अतार्किक विरोध नहीं करते थे, जिन्हें सिर्फ मोदी सरकार में कमियां निकाल कर जनता को भ्रमित करना या बरगलाना होता है. उन्हें मोदी जी द्वारा किये जा रहे अच्छे कार्य कहीं भी दिखाई नहीं देते या देखना नहीं चाहते. वे कभी जनता से वायदा नहीं करते देखे जाते की यदि अबकी बार वे सत्ता में आये तो मोदी जी से भी बेहतर कार्य कर  के दिखायेंगे. वे सिर्फ मोदी की आलोचना कर अपने उद्देश्य को पाने की चेष्टा करते हैं.शायद वे आज भी जनता को दशकों पहले की भांति भोली भाली और अज्ञानी समझते हैं. आज देश की जनता सब समझती है. इस प्रकार की नकारात्मक राजनीति लोकतंत्र के लिए और देश हित के लिए घातक है.परन्तु आज के नेताओं को सिर्फ अपनी कुर्सी की चिंता बनी रहती है चाहे उसके लिए देश की सुरक्षा से समझौता ही क्यों न करना पड़े,देश के दुश्मनों से ही क्यों न हाथ मिलाना पड़े. यह अटल जी द्वारा ही संभव था जिन्होंने बंगला देश युद्ध जीतने के पश्चात् इंदिरा गाँधी को ‘दुर्गा’ कह कर सम्मानित किया और बंगला देश की जीत का श्रेय उन्हें दिया. जो आज किसी विरोधी पार्टी के नेता द्वारा संभव नहीं है.

   आम पाठक की उत्सुकता होगी की यदि बाजपेयी जी इतने ही लोकप्रिय थे तो 2004 में आम चुनाव क्यों नहीं जीत पाए. 2004 के चुनावो में उनकी हार को सिर्फ इस प्रकार से देखा जा सकता है की उनकी पार्टी उनकी सरकार की उपलब्धियों और भावी योजनाओं की जानकारी जनता तक ठीक से नहीं पहुंचा  पाई अर्थात पार्टी संगठन द्वारा चुनाव प्रचार में कहीं न कहीं कमी रह गयी और कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति चुनावी पटल पर भारी पड़ गयी और भा.ज.पा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा.

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