शर्मनाक राजनीति


{रिज़र्व बैंक के  गवर्नर रहे वाई. वी. रेड्डी की पुस्तक ‘ADVISE AND DECENT’ से कुछ अंश साभार प्रस्तुत हैं}

1991 में कांग्रेस के शासनकाल में, मात्र 40 करोड़ रुपए के लिए  47 टन सोना गिरवी! मुझे स्मरण है, 90 के शुरुआती दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था को वह दिन भी देखना पड़ा, जब उसे अपना सोना विश्व बैंक में गिरवी रखना पड़ा। राजीव गांधी के शासन काल में,  देश की तिजोरी खाली हो चुकी थी।  प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या लिट्टे के आतंकियों ने कर दी थी। चन्द्रशेखर तब नए-नए प्रधान मंत्री बने थे, तिजोरी खाली देख कर घबरा गए। क्या करें, क्या न करें।

श्री रेड्डी लिखते हैं कि पूरे देश में एक तरह का निराशा भरा माहौल था, राजीव शासनकाल में कोई रोज़गार सृजित न हुए। एक व्यवसाय के 50 जगह से NOC लेकर आना पड़ता था।कांग्रेस द्वारा स्थापित लाइसेंस परमिट के उस दौर में, चंहु ओर बेरोज़गारी और हताशा का अलाम था। दूसरी ओर देश में, मंडल और कमंडल की लड़ाई छेड़ी हुई थी। 80 से 90 के दशक तक, कांग्रेस ने अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया। उसी दौरान बोफोर्स तोपों में दलाली का मामला सामने आया।

पुस्तक में रेड्डी लिखते हैं कि गाँधी परिवार की अथाह लूट ने देश की अर्थ-व्यवस्था को रसातल में पंहुचा दिया। उन दिनों, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि RBI ने अपना सोना विश्व बैंको में गिरवी रखने का निर्णय किया। इतने विकट हालत थे कि देश के पास तब केवल 15 दिनों का आयात करने लायक ही धन था। कितनी भयानक स्थिति होगी, जिसका आप स्वयं ही अन्दाज लगा लीजिये कि भारत के पास तब मात्र 1अरब डालर का ही विदेशी मुद्रा का भंडार बचा हुआ था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के आदेश से, भारत ने 47 टन सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में गिरवी रखा था।

रिज़र्व बैंक के  गवर्नर रहे वाई. वी. रेड्डी लिखते हैं कि उस समय भी एक दिलचस्प और भारतीय जनमानस को शर्मसार व झंकझोर करने वालीं घटना घटीं। वाक्या यह है कि RBI को बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में 47 टन सोना पहुंचाना था। यह वह दौर था, जब मोबाइल तो होते नहीं थे और लैंड लाइन सुविधा भी सीमित मात्रा में हुआ करती थी। नई दिल्ली स्थित RBI का इतना बुरा हाल था, कि भवन से 47 टन सोना नई दिल्ली हवाई अड्डे पर एक वैन द्वारा पहुंचाया जाना था। वहां से ये सोना इंग्लैंड जाने वाले जहाज पर लादा जाना था। किन्तु 90 के दशक में, भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था और RBI कितनी लचर स्थिति में थी, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 47 टन सोना लेकर एक बेहद पुरानी RBI की वैन केवल 2 सुरक्षा कर्मियों के साथ हवाई अड्डे पर भेजी गयी थी। रास्ते में, वैन के 2 टायर पंचर हो गए, जिसकी सुरक्षा व्यवस्था मात्र 2 सुरक्षा कर्मियों के ऊपर निर्भर थी। खैर! बड़ी कठिनाईयों के साथ सोना इंग्लैंड पहुंचा। जिसके उपरांत ही ब्रिटेन ने भारत को 40.05 करोड़ रुपये का ऋण दिया। किसी देश के लिए इससे अधिक अपमान और लज्जा की बात क्या हो सकती है?

    बहुत ही दुःख, हैरानी व क्रोध का विषय है, जब देश को केवल 40 करोड़ रुपये के लिए गिरवी रखने वाले लोग कहते हैं, कि मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को छिन्न- भिन्न करके रख दिया।हिंदुस्तान के 70 वर्षों के इतिहास में, केवल 3 वर्ष ऐसे हैं, जिसमे हिंदुस्तान ने वैश्विक वित्तकोष से 1/- रुपये का भी ऋण नही लिया। और वे 3 वित्तीय वर्ष हैं –  2015-16, 2016-17 व 2017-18. और जी हां, ये तीनों साल चायवाले की सरकार के ही हैं। फिर भी मोदी जी को ‘नीच’,’चोर’ जैसे अपमान जनक शब्दों से अपमानित किया जाता है.शायद हमें अपने कानूनों में बदलाव की आवश्यकता है ताकि देश के प्रधान मंत्री को कोई भी अपमान जनक टिप्पड़ी करने की हिम्मत न कर पाए.प्रधान मंत्री का अपमान देश का अपमान समझा जाना चाहिए.जिसकी अनुमति किसी को भी नहीं दी जा सकतीं.

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