जीवन का स्वर्णिम अध्याय है, चालीस और पचपन के मध्य की आयु


       यदि आप चालीस और पचपन आयु वर्ग में आते हैं तो आप एक स्वर्णिम आयु वर्ग में हैं और आपको इस सुनहरे अवसर का भरपूर आनंद उठाना चाहिए. अब जानते हैं ऐसा क्यों?

             बाल्यावस्था–जब इन्सान जन्म लेता है तो उसे दुनिया की कोई जानकारी नहीं होती उसे चलना, फिरना, बोलना, खाना, पढना-लिखना, समझना, सभी कुछ सीखना होता है. अतः सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्त होते हुए भी जीवन के आनंद नहीं ले पाता. जबकि वह सर्वाधिक् मस्ती इसी पड़ाव पर करता है, उसे किसी प्रकार  की चिंता भी नहीं होती. सब कुछ उसे स्वतः ही माता पिता या अभिभावकों द्वारा उपलब्ध कराया जाता है. जिस परिवार एवं समाज में उसने जन्म लिया होता है,सब जिम्मेदारी वही परिवार और समाज उठाता है, साथ ही उसे भरपूर प्यार मिलता है. पैदा होने से लेकर पंद्रह वर्ष (किशोरावस्था) तक के समय को बचपन के रूप में देखा जाता है. जिसे मस्ती भरा जीवन भी कहा जाता है.परन्तु दुनिया मानव जीवन के मनोरंजन या आनंद से अनभिज्ञ ही होता है.

      युवा अवस्था—किशोरावस्था में प्रवेश करते ही बच्चे को अपने शरीर में हो रहे बदलावों से परिचित होना पड़ता है,इसके अंतर्गत उसे शारीरिक आवश्यकताओं का भी आभास होने लगता है जिसमे उसे असीम आनंद की अनुभूति होने लगती है.परन्तु सामाजिक बंधनों के कारण,अपूर्ण शारीरिक क्षमताओं के कारण जीवन का आनंद प्राप्त कर पाना संभव नहीं होता. इस समय उसकी प्राथमिकता होती है अपने भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करना. किशोरावस्था के अंत तक वह अक्सर माध्यमिक शिक्षा स्तर तक पहुँच चुका होता है. इस स्तर पर उसे अपने भविष्य की रणनीति तैयार करनी होती है और अपने उद्देश्य के अनुसार अपने शिक्षा की दिशा निश्चित करनी होती है.और फिर अपने कर्रियर के लिए प्रतिद्वंद्विता का सामना करने के लिए अथक परिश्रम करना होता है ताकि वह सफलता पूर्वक अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके.इस दौरान उसे बार बार होने वाली परीक्षाएं और अभिभावकों द्वारा निरंतर डाले जाने वाले दबाव के कारण उसे अनेक मानसिक तनावों को सहन करना पड़ता है. उसे अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना होता है और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल होने के भय से तनाव में रहता है.यद्यपि जो मेधावी छात्र होते हैं उन्हें आत्मविश्वास बना रहता है.परन्तु परिश्रम तो करते रहना ही होता है. यदि वह अपनी इच्छानुसार शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है तो फिर अपने जॉब के लिए अनेक प्रतियोगितओं से गुजरना होता है यदि नौकरी करनी है तब भी और यदि अपना ही कोई कार्य करना होता है तो भी कम से कम पांच वर्ष लग जाते हैं उसे पूर्णतयः अपने जीवन की गाड़ी को पटरी पर लाने  में कभी कभी तो अधिक समय भी लग जाता है. इन सब क्रियाकलापों के साथ शारीरिक आवश्यक्ताओं की पूर्ती के लिए भी प्रयास करने होते हैं. इस दौरान उसे विवाह और परिवार का धर्म भी निभाना होता है.  इस सब उधेड़ बुन में और अपनी जिन्दगी को स्थापित कर पाने में उसकी आयु चालीस वर्ष हो जाती है.

MIDDLE AGED MAN

     सुनहरी अवस्था (चालीस और पचपन के मध्य)—समस्त जीवन में जीवन की यह अवस्था सर्वाधिक सुनहरी होती है.जब व्यक्ति के पास नौ जवान वाली ऊर्जा विद्यमान होती है.अपने जीवन साथी के साथ उसका सामंजस्य बन चुका होता है. उसे जीवन और दुनिया का काफी अनुभव भी हो चुका होता है.वह अपने कार्य में निपुण हो चुका होता है. सांसारिक जीवन को जीने की समझ आ चुकी होती है और जीवन में आने वाली बाधाओं को पार करने की योग्यता आ जाती है.परिवार में बच्चे अभी किशोर अवस्था अथवा युवावस्था में प्रवेश कर चुके होते हैं. उनके भविष्य के लिए तय्यारी में अभी समय बाकि होता है. अतः कोई विशेष तनाव झेलने वाली स्थिति नहीं होती और आप अपनी इच्छानुसार अपने घर को व्यवस्थित कर सकते हैं, मनोरंजन कर सकते है, घूमने फिरने के लिए अर्थात पर्यटन के लिए स्वर्ण अवसर निकाल सकते हैं. क्योंकि आर्थिक रूप से आप आत्मनिर्भर होते है,शारीरिक रूप से सक्षम होते है, ताकि पर्यटन का आनंद ले सकें. बच्चों के भविष्य की तय्यारी में योगदान करने में पूर्णतयः सक्षम होते है. यह समय जीवन में फिर से नहीं मिल पाता,अतः जो भी व्यक्ति उम्र के इस पड़ाव पर हो उसे अपनी सभी आकांक्षाएं ,सभी इच्छाएं अपनी क्षमता के अनुसार पूर्ण कर लेनी चाहिए. आगे आने वाले समय में इतनी स्वतंत्रता, इतनी ऊर्जा, इतना उत्साह, मिलने सम्भावना बहुत कम होती है.अतः इस समय को भरपूर उत्साह के साथ जीना चाहिए यह समय फिर नहीं आने वाला.

MIDDLE AGED WOMAN

     वृद्धावस्था-इस आयु के पश्चात् वृद्धवस्था प्रवेश कर जाती है जिसमें अनेक शारीरिक व्याधियां  जन्म लेने लगती है. आर्थिक रूप से भी अक्सर अक्षमता आने लगती है.परिवार पर बच्चों का दबदबा बढ़ने लगता है. अतः आप स्वतन्त्र रूप से कार्य नहीं कर पाते. आपके निर्णय में अनेक अडचने आने लगती हैं,अर्थात  आत्मनिर्भरता समाप्त होने लगती है.आपका जीवन साथी भी आपके निर्णयों को नकार कर बच्चों को प्राथमिकता देने लगता है. अतः मानसिक,शारीरिक और आर्थिक तीनों मोर्चों पर आप अक्षम हो जाते हैं.अतः जीने का वह उत्साह नहीं रहा पाता.यद्यपि अनेक व्यक्ति सौभाग्य शाली भी होते हैं जो अस्सी वर्ष तक भी उपरोक्त समस्याओं से बचे रहते हैं.परन्तु ऐसे सौभाग्य शाली लोग बहुत कम होते हैं.

     अतः जीवन के स्वर्णिम समय को(चालीस और पचपन के मध्य अवधि) यथा शक्ति मदमस्त होकर जीया जाय तो बुढ़ापे में मलाल नहीं रहता. (SA-249B)  


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